मैं छत पर बैठे हुए
चाँद से बतियाते रहा
सारी रात ।
सुनो चाँद ,
मेरी प्रिया निराली सी है
नमकीन चाय की प्याली सी है
मेरी प्रिया भोली सी है
पोदीने की गोली सी है ।
वह चित-चोरनी
सावन में पंख फैलाकर
नाचती हुई मोरनी ।
वह जब लहराती है
अपने खुले बाल
घटाएँ शरमाकर
हो जाती हैं ओझल,
उसके होंठ गुलाब की
पंखुरियों से कोमल ,
मैंने अक्सर देखा है
तितलियों को मँडराते
उसके इर्दगिर्द ।
वह चहकती है ऐसे
भोर भए ज्यों करे
पंछी कलरव ,
उसकी आँखों में जादू
काली बदली की
सुरमेदानी से ज्यों
लगाया हो चुराकर सुरमा।
चाँद, में क्या कहूँ ....कितना कहूँ ....
तुम खुद ही देखना
मेरी प्रिया को ....
उसने वादा किया है
आज की रात
मुझसे मिलने का ।
चाँद , वो आती ही होगी
तुम सोना नहीं
जागे रहना मेरे साथ
करते रहो मुझसे बातें
मेरे और मेरी प्रिया के
बारे में ।
ए रात , तुम ठहरो अभी
लम्हा लम्हा रहो मेरे साथ
मेरी प्रिया आएगी
आज की रात ।
रात ,चाँद और मैं
तीनों जगे रहे ...
जगे रहे जगे रहे ...
आखिर रात ने कहा- मैं चली
चाँद ने कहा - मैं चला
और मेरी आँख लग गई ।
दिन चढ़े ,
सूरज ने जगाया मुझे
और कहा --
'सुनो ,
नदी में बहा रही
एक लड़की
प्रेमपत्र !!!!!!
-- अजीतपाल सिंह दैया
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