Saturday, March 5, 2011

"द गर्ल विद ब्लू आईज़"

अल्बर्ट हॉल के
ठीक सामने वाली रोड के किनारे
गुल मोहर के एक बूढ़े दरख़्त के नीचे
एक टूटी हुई बेंच
जिस पर पुते हरे रंग की
पपड़ियाँ उखड चली थीं ,
पर बैठ कर
उसे रोज़ देखना
मेरा शगल था ,
अल सुबह
वह हमेशा ही आया करतीं थी
एक कटोरी ज्वार लेकर
और शिद्दत से फेंका करती थी
कबूतरों को दाना ,
कबूतरों का दल भी
शायद आशना हो गया था
उसके पदचापों का
कि उसके आने की आहट मात्र से
खींचे चले आते थे उसकी जानिब
बिला संकोच , निडर से
वे नीले नीले कबूतर
और उसका नीला दुपट्टा
अरे हाँ ,मैंने तो उसे
हमेशा ही उसी नीले दुपट्टे में देखा था ,
पता नहीं उसके पास
एक वही दुपट्टा था या
उसी रंग के कई दुपट्टे.
मैंने ऐसा महसूस किया था
कि उसे नीले रंग से प्यार था,
नीला दुपट्टा ,नीली चूड़ियाँ
और नीले कबूतर
और फिर मैंने रोज़ ही
देखा था उसे ,
कबूतरों को पूरे दाने 
फेंकने के बाद 
अल्बर्ट हॉल की पृष्ठ भूमि में 
नीले नीले आसमान को कुछ मिनटों तक
लगातार निहारना ,
पता नहीं क्यूं ,
पर में पूरे विश्वास से 
कह सकता हूँ 
कि उस वक्त भी वह 
अल्बर्ट हॉल को नहीं ,
नीले आसमान को निहार रही होती थीं.
एक दिन जाने कहाँ से 
मुझ में हिम्मत आई 
वरना मैं तो हमेशा से ही रहा हूँ 
दब्बू -संकोची किस्म का ,
हाँ एक दिन 
मैंने उसके पास जाकर कहा -
"तुम शायद मुझे नहीं जानती 
पर ..पर ...फिर भी 
मेरी तरफ से यह ...
तुम्हारे खुले बालों को 
तुम इस से बांधना
बहुत खूबसूरत लगोगी " 
मेरे हाथों से नीला रिबन लेते हुए
उसने कहा -
"गुल मोहर वाले लड़के
मैं तुम्हे जानती हूँ.."
सिर्फ इतना कह कर
तेज़ क़दमों से चली गयी वह
रामनिवास बाग के मेन गेट की तरफ .
अगले दिन सुबह
जब वह कबूतरों को
चुग्गा डालने आई
तो उसके बालों में
बंधा हुआ था नीला रिबन.
कुछ देर बाद जब
वह खिला चुकी थी दाने कबूतरों को
तो तेज़ क़दमों से मेरी तरफ बढ़ी ,
उसे इतनी तेज़ी से मेरी तरफ
आते देख मैं सहसा सहम गया ,
मेरे पास आकर उसने
अपने दुपट्टे में छुपाया हुआ
एक पैकेट निकल कर मुझे थमाया
और बोली -
"शुक्रिया ,गुलमोहर वाले लड़के "
और मुस्कुराते हुए चल दी मेनगेट की तरफ,
मैं उसे तब तक देखता रहा 
जब तक उसके काले बालों पर बंधा 
नीला रिबन ओझल न हो गया .
मैंने  नीले रिबन से बंधे उस पैकेट को
खोल कर देखा -
उसमें नीले कवर वाली
एक खूबसूरत डायरी थी
तथा था एक अंग्रेजी उपन्यास
"द गर्ल विद ब्लू आईज़"
उस दिन के बाद
फिर कभी मुझे
दिखायी नहीं दी
नीली आँखोंवाली वह लड़की .....
@अजीत पाल सिंह दैया

Sunday, February 20, 2011

मैंने चिर साधना की है

मैंने चिर साधना की है 
युग भारित कण कण जम
मैं आज महापाषाण हुई ,
काल कुठाराघात सहकर
संजीवन थी निष्प्राण हुई .
 
निष्प्राण सही ,साकार बनूँ
सिर्फ तेरा आकार बनूँ
मैंने यही प्रार्थना की है .
मैंने चिर साधना की है .
 
गर्वित हिम खंड खंड हो
करुणा प्रवाह में बह गया,
उत्तुंग शिखर चूर चूर हो
रेती बनकर रह गया .
 
इस रेती में पद चाप बने
हृदय स्पंदन का ताप बने
मैंने यही आराधना की है .
मैंने चिर साधना की है .
 
तपस्विनी मैं ,प्रतीक्षा में तपकर
पिघल गयी हूँ नीर होकर ,
रेंगती रही सर्पिल पथ पर
विरहिणी मैं ,अधीर होकर
.
 
ढूंढ रही हूँ अंकोर तेरी
जिसमें विलीन हो रूह मेरी
मैंने यही वंदना की है .
मैंने चिर साधना की है.
 

-अजीत पाल सिंह दैया

अधीर हृदय पर मूक अधर

तड़प मेरी फूलों में घुलकर
महक रही है मधुमय होकर ,
भ्रमर प्रतीक्षा कब तक होगी
डरती क्षण क्षण सिहर सिहर.
मेरे हृदय स्पंदन को छूकर
स्नेह आवेगों की ऊष्मा पाकर ,
समीरण सन्देश तो लाया होगा
उबल रही है मन की लहर .
विरह का मधु आसव पीकर
फिर लज्जालु होठों को सीकर ,
धधक रही अंतस की ज्वाला
उग्र हो रही है मंथर मंथर .
ढूंढ रही मैं सुध बुध खोकर
नयनों को अश्रु से धोकर ,
केवल बिम्ब तुम्हारा दीखता
मेरी पड़ रही है दृष्टि जिधर .
मन हल्का हो अंतस को कहकर
पीड़ा को शब्दों में पिरोकर ,
जाने क्यों मैं इतनी विवश
अधीर हृदय पर मूक अधर .
-अजीत पाल सिंह दैया

Saturday, November 20, 2010

नज्मों वाले बाबा

बहुत दिन हुए
गुलमोहर पर रहनेवाली
बुलबुल है परेशान
कि एक मुद्दत से
उनकी कोई नज़्म नहीं आई .
बहुत दिन हुए
मेरे बिम्ब का प्रयोग कर
उसने कोई नज़्म नहीं लिखी
प्रिया के लिए -
यह सोच सोच
चंचल चाँद है हैरान .
चाँद से रहा न गया
एक रोज़ उसने बुलबुल से कहा -
ए बुलबुल ,ज़रा उनके घर जाकर
मालूम तो करो
कि आखिर माजरा क्या है
नज्मों वाले की कलम
इतने दिनों से खामोश क्यों है ?
मैं नयी नज़्म सुनने को हूँ बेक़रार
बुलबुल उनके घर देख आओ न इकबार .
फिर ..अगले रोज रात को
बुलबुल ने चाँद को बताया -
नज्मों वाले बाबा तो बबली को
सिखा रहें है
तख्ती पर चाक से
अलिफ़ बे पे से ..लिखकर ,
और प्रिया रसोई में साम्भर -डोसे बना रही है .
पर पर ....
बाबा के कुरते में
मुझे मिली कुछ पर्चियां ...
चाँद बीच में बोला -
ज़रूर उन पर नज्में लिखीं होंगी !!
बुलबुल बोली -
अरे नहीं तो ,
उन पर्चियों पर लिखा था
"मूंग दाल -एक किलो
चना दाल -आधा किलो
अमूल घी -दो किलो
शक्कर -दो किलो
चाय पत्ती- रेड लेबल बड़ा पेकेट
......!!!!!!!!!! "
-अजीत पाल सिंह दैया

Friday, November 19, 2010

निशां

'कितनी दफा
किया था मना
गली में मत खेलो
बबली के संग ,
चोट लग ही गयी न
सलोने चेहरे पर
अब तुम
यूं ही दूर से
देखा करो
जब तलक
चेहरे के ये निशां
मिट न जाये '
... और प्रिया ने
बिठा दिया फलक पर
बेचारे चाँद को !!!
 
-अजीत पाल सिंह दैया

Sunday, October 24, 2010

चाँद पर बारिश

उस दिन
हम चाँद पर थे,

उसने बित्ते भर का गड्डा खोदा,
अपने पर्स से निकालकर
इमली का एक बीज
गड्डे में रख
ढांप दिया मिटटी से.
मैंने कहा-
पागल हो गयी हो प्रिया!
चाँद पर बीज बो रही हो ? 

प्रिया ने चुप रहने का इशारा किया
और हल्के से मुस्कुरायी.
वह घुटनों के बल बैठी, 

आकाश की ओर उठे
उसके दोनों हाथ,

खुदा से एक मुख्तसर सी
गुजारिश हुई ,और..........
...
उस रोज पहली दफा
चाँद पर बारिश हुई
-अजीतपाल सिंह दैया 

Saturday, April 10, 2010

त्रिवेणियां

१
अमावस की रात फलक पर देखा कि
तारे झूम रहे थे 'मेक्सिकन वेव 'बनाकर

कहकशां से गुजर रहा था मैं ,प्रिया के संग ।
***
२
अम्मी से पूछो बबली , आज अमावस है क्या
चाँद नज़र नहीं आ रहा है अब तलक आकाश में
कैसे नज़र आएगा बाबा ,वोह तो मेरी ड्राइंगबुक में है।
***
३
होठ जल गए थे मेरे बोसा लेते वक्त
गुस्सा धर रखा था तबस्सुम की जगह
सिगापुर से गिफ्ट नहीं लाया था उसके लिए ।
***
४
मेज़ पर देर तलक बैठा रहा मैं
हाथ में शीशे के पेपरवेट के टुकड़े लिए
टूटे हुए सपने कहाँ कभी जुड़ा करते हैं ।
***
-- अजीत पाल सिंह दैया