Sunday, February 14, 2016

दो लड़कियां

यह एक छोटा सा शहर था। क्यूँ कि छोटा था तो अभी इसमें बड़े होने का ग़ुरूर नहीं था। इसका प्रमाण शहर के लोग थे। लोगों के आचरण से शहर का ग़ुरूर जाना जा सकता है। जहाँ ग़ुरूर कम रहता है वहाँ प्रेम ज़्यादा रहता है। इसलिए इस छोटे शहर के लोग बहुत संवेदनशील थे। प्रेम और भाईचारे से रहते थे। यह भाईचारा राह चलते लोगों में भी देखा जा सकता था। यहाँ राह चलते अगर किसी से थोड़ा कंधा टकरा जाए तो चार आँखें आपस में घूर कर नहीं देखती थी। आँखों में अपणायत झलकती थी। आँखें चार होती थीं। होठों पर मुस्कान उभर आती थीं। और राहें फिर गतिमान हो जाती थीं। एक राह ऐसी ही थी। इस छोटे से शहर के लगभग मध्य में। यह राह असल में एक पतली गली थी। इस राह पर एक नया राहगीर आया था। यह राह दो लम्बी गलियों को जोड़ती थी। पहले यह गली अनजानी थी। पर अब उस राहगीर के दिमाग में इस नयी राह का नक्शा भलीभांति छप गया था। अब वह आँख बन्द करके भी इस पतली गली से होकर एक लंबी गली में से होता हुआ स्टेशन रोड़ पर आकर एक स्टेशनरी की दुकान के बगल की गली से होकर हाई स्कूल तक पहुंच सकता था। यह राहगीर हाई स्कूल में पढ़ने वाला सोलह साल का एक लड़का था।

इस साल उसने हाई स्कूल में दाख़िला लिया था। दसवीं में वह गांधी चौक स्थित गांधी स्कूल में पढ़ता था। चूँकि यह स्कूल सिर्फ दसवीं तक ही थी तो उसने दसवीं उत्तीर्ण करने के बाद हाई स्कूल में दाखिला लिया था। इसलिए अब उसकी दैनिक राहें भी बदल गयी थी। ढाणी बाज़ार वाले चहल पहल वाले रास्ते की बजाय अब वह इस पतली गली से होकर जाने लगा था। इस पतली गली में लोगों की आवाजाही बहुत कम थी। वह अपने घर से निकलने के बाद क़रीब पंद्रह मिनट में इस पतली गली तक पहुँचता था। पतली गली के कॉर्नर पर एक दर्ज़ी की दुकान थी। दर्ज़ी सुबह से शाम तक अपनी सिलाई मशीन पर लगा रहता था। उसे सिलाई करना पसन्द नहीं था पर उसे इसके अलावा कोई और काम नहीं आता था। उसने पढाई में ध्यान नहीं दिया था। हालाँकि उसके पिता ने उसे पढ़ाने की भरपूर कोशिश की थी पर उसे गणित और अंग्रेजी बिलकुल नहीं आती थी। हारकर उसने पढ़ाई छोड़ दी और इस दुकान पर बैठने लग गया। यह दुकान पहले उसके चाचा चलाते थे।

दर्ज़ी स्कूल के बच्चों की नेकरें सिलता था। लड़के को उस दर्ज़ी पर दया आती थी। दिन भर बिचारा नेकरें सीता है। एक दिन जब वह दर्ज़ी की दुकान के क़रीब से गुजर रहा था तो उसका कंधा एक राहगीर से टकरा गया। यह एक एक्सीडेंट था। उसका कारण भी यही था कि वह उस समय भी दर्ज़ी की दुर्दशा के बारे में सोच रहा था। बहरहाल, जिस कंधे से उसका कंधा टकराया वह कंधा एक लड़की का था। उसने हड़बड़ा कर उधर देखा। उस लड़की ने कुछ नहीं कहा। मुस्कुरायी भी नहीं। वह सॉरी कहना चाहता था पर वह कुछ सुनना ही नहीं चाहती थी। कंधे से कंधे टकराने से लड़की की चाल में बस कुछ पल का व्यवधान हुआ। वह तुरन्त सम्भल गयी थी और आगे बढ़ गयी जैसे कि कुछ हुआ ही नहीं। असल में वह लड़की अकेली नहीं थी। उसके साथ एक लड़की और थी। दोनों लड़कियां एक जैसी गणवेश पहने थी। सफ़ेद सलवार और आसमानी कुरता। उनकी चुन्नी का रंग भी सफ़ेद था। चुन्नी को उन्होंने अपने वक्ष पर वी बनाकर गले से होते हुए पीठ पर लटकाये रखा था। दोनों के कदों में काफी फर्क़ था। लम्बे कद वाली लड़की दूसरी लड़की से दो या तीन इंच लम्बी रही होगी। इन लड़कियों का वहाँ से गुजरना शायद दर्ज़ी भी नोटिस करता था। लड़के को लगा कि वह दर्ज़ी ठीक उसी समय अपनी सिलाई मशीन से ध्यान हटाकर दुकान से बाहर झांकता था। वह आँखों ही आँखों में बिना अपने इंची फ़ीते के उन लड़कियों के सलवार की लम्बाई, नितम्ब और क़मर का घेरा एवं वक्षों की परिधि नाप लेता था। यह उस लड़के का ख़याल था। उसने दर्ज़ी को मन ही मन कोसा और आगे बढ़ गया।

अगले दिन। जब वह ठीक उसी समय पतली गली से दर्ज़ी की दुकान के सामने से गुजर रहा था तो उसने सामने से आती उन दो लड़कियों को देखा। ये वे ही लड़कियां थीं जिन्हें उसने कल एक झलक देखा था। आज उसने दोनों लड़कियों को अच्छे से देख लिया था। दोनों लड़कियों की छवियाँ उसने अपने मस्तिष्क में अंकित कर ली। लड़कियां आज भी अपनी गणवेश में थीं। सफ़ेदझक सलवार और आसमानी कुरता। आसमानी कुरता इतना आसमानी था कि लगता था कि किसी दर्ज़ी ने आसमान को कैंची से काटकर सिला हो। पर यह इस पतली गली वाले दर्ज़ी के बस की बात नहीं थी। यह दर्ज़ी केवल ख़ाकी नेकरें ही सिला करता था।

लड़कियों की झीनी सफ़ेद चुन्नी बड़े करीने से उनके बदन पर लिपटीं रहती थी। आज उसने लड़कियों के चेहरों को भी अच्छी तरह देख लिया था। लम्बी लड़की का रंग सांवला था। नाक तीखी। पतले होंठ। होंठों का रंग हल्का गुलाबी। आँखे बिदामी। आइब्रो गहरे काले। कान थोड़े से दबे हुए पर सफ़ेद मोती वाला लूँग दोनों कानों में। दिखने में भली ही दिखती थी। मुस्कुराहट पर पूरा नियंत्रण। उसकी इज़ाज़त की बिना दोनों होंठ बिलकुल अनुशासित सिपाही की तरह अपनी जगह पर क़ायम। छोटी लड़की केवल लम्बाई में ही छोटी थी अन्यथा दोनों हम उम्र थीं और एक ही कक्षा में पढ़ती थीं। छोटी लड़की लम्बी लड़की से थोड़ी ज़्यादा आकर्षक थी। लम्बे बाल थे उसके। लम्बी लड़की के बालों से भी अधिक लम्बे। वह लम्बी चोटियां करती थीं। उसकी चोटियों में दो नीले रिबन तितलियों की भांति लगतीं थीं। छोटी लड़की का चेहरा कोणीय था। ठुड्डी थोड़ी तीखी। नाक दरमियाना पर थोड़ी उठी हुई। होंठ जरा से मोटे पर बिलकुल गुलाब की दो पंखुरियों जैसे खूबसूरत। लड़की गोरी थी तो उसके गुलाबी होंठ और भी निखर गए थे। आँखें गहरी काली और चंचल हिरणी की आँखों जैसी। कान बड़े पर चेहरे के बिलकुल अनुपात में। कानों में यह लटकनें पहनती थी अलग अलग रंगों की। मूँगिया रंग की लटकनों में उसके कान ज़्यादा सुन्दर दिखते थे। दोनों लड़कियां जब गली में सामने से आती थी तो आपस में हंसी ठिठोली करते हुए आती थी। ठिठोली की पहल आमतौर पर छोटी लड़की करती थी क्योंकि वह चंचल थी। लंबी लड़की को सुविधा के लिए हम बड़ी लड़की कह लेते हैं। तो बड़ी लड़की गंभीर थी पर वह उसकी ठिठोली में शामिल हो जाती थी। हालाँकि वह अपने दोनों होठों को थोड़ा कस लेती थी ताकि ज़्यादा नहीं हंस सके। शायद कम हँसना उसे विरासत में सिखाया गया था।

छोटी लड़की उच्छंखृल थी। वह खुल कर हँसती थी। वह जब हंसती थी तो बड़ी लड़की की तरह अपने होंठों को भींचती नहीं थी। हँसते समय सुंदर और सफ़ेद दांत दिखते थे उसके। शायद वह वही मंजन करती थी जो राजू करता था। राजू वही लड़का था जो टीवी पर आता था और उसके मास्टरजी उसे कहते थे कि राजू तुम्हारे दांत तो मोतियों से चमक रहे हैं। एक और फर्क़ दोनों लड़कियों में था। बड़ी लड़की कुछ जिम्मेदार किस्म की थी। इसी जिम्मेदारी के बोझ से उसके कंधे हल्के से दबे हुए थे। छोटी लड़की बेपरवाह थी। उसके कंधे भी बेपरवाह थे। उसी बेपरवाही के कारण उसके कंधे लड़के के कंधे से टकराये थे। लड़का दोनों लड़कियों से सम्मोहित था। बदकी लड़की जो लम्बी और सांवली थी, में अलग सम्मोहन था तो छोटी और गोरी लड़की में भी एक अलग सम्मोहन था। पर वह छोटी लड़की के प्रति ज़्यादा सम्मोहित था। बड़ी लड़की का कद करीब क़रीब लड़के के कद के आसपास ही था या वह कम से कम लड़के के कान की ऊपरी किनारी तक लम्बी तो थी ही। छोटी लड़की लड़के के कान के कुछ नीचे तक आती होती होगी। अब एक लड़का, दो लड़कियों और दर्ज़ी उस पतली गली के अनिवार्य हिस्से बन गए थे। सभी एक दूसरे की दिनचर्या में शामिल हो गए थे खासकर उन लम्हों में जब वे तीनों दर्ज़ी की दुकान के आसपास होते थे। लड़कियां उस लड़के के बारे में सोचती थीं या नहीं ठीक से नहीं कहा जा सकता पर इतना जरूर तय था कि वे उसको रोज़ गली में ठीक उसी समय देखतीं ज़रूर थीं। और यह दृश्य उनके आँखों में अनिवार्यत क़ैद होता था। इतवार इसका अपवाद था। इतवार को दोनों लड़कियां ठीक इस समय कहाँ होती थी किसी को नहीं मालूम था। वे अपने घर पर होती थीं या अपनी नानी के घर चली जाती थीं या फिर दोनों ही किसी तीसरी लड़की के घर जाकर गड्डे खेला करती थीं। कोई नहीं जानता था। इतवार के बारे में यह भ्रम बना हुआ था।

पर शनिवार रंगीन होता था। मतलब यह कि शनिवार को लड़कियां ठीक उसी समय पतली गली में होती थीं पर इस दिन उनकी पोशाक सफ़ेद सलवार और आसमानी कुरता नहीं होता था। इस दिन वे अपनी मर्जी की मालिक होती थीं। वे रंगीन लिबास में होती थीं। रंगीन कपड़ों में दोनों और भी ज़्यादा सुंदर दिखतीं थीं। लम्बी पर सांवली लड़की अपने ऊपर फबने वाले लिबास पहनती थी। उसका ड्रेसिंग सेंस अच्छा था। उसे मालूम था कि उसके सांवले रंग पर कौनसे रंग का कपड़ा अच्छा लगेगा। यह सेंस उसको जन्म से ही था या उसकी माँ ने सिखाया था नहीं मालूम। पर हर शनिवार को वह अपने रंगीन लिबास में अपने सांवलेपन के बावजूद अधिक आकर्षक नज़र आती थी। छोटी लड़की को कोई विशेष ड्रेसिंग सेंस नहीं था। पर उसकी यह कमी उसका गोरा रंग ढंग ढांप देता था। उसको अपना लिबास चुनने में कोई ख़ास मेहनत नहीं करनी पड़ती थी। कोई भी रंग उसको सूट कर जाता था। हालांकि वह हरे रंग में ज़्यादा सुंदर दिखती थी। यह बात उसे शायद मालूम नहीं थी। नहीं तो उसके वार्डरॉब में हरे रंग के कपड़े ज़्यादा होते। उसके पास असल में हर रंग के कपड़े थे। उसकी रंगों में कोई ख़ास पसन्द या नापसंद नहीं थी। पर जब वह हरे रंग का सूट पहन कर आती थी तो कसम से बड़ी लड़की भी उसकी सराहना करती थी। उस दर्प से छोटी लड़की की आँखों में चमक आ जाती थी। उस चमक से वह लड़का भी चुंधिया जाता था।

अब इस सिलसिले को काफी वक़्त हो गया था। दर्ज़ी अपनी दुकान पर हमेशा की तरह व्यस्त रहता था। ख़ाकी नेकरों के साथ साथ अब उसने नीली पतलूनों की सिलाई भी शुरू कर दी थी। अब वह सिलाई मशीन से सिर उठा कर बाहर कम ही देखता था। उधर वह गली उस लड़के और दोनों लड़कियों से अच्छी तरह आशना हो गयी थी। जब उस लम्हे तीनों एक साथ गली से गुज़रते थे तो गली में एक प्रकार की खुशबू हवा में फैल जाती थी। यह खुशबू एक सेंट की थी। यह सेंट कौनसी लड़की लगाती थी नहीं मालूम। दोनों लड़कियां अभी भी उस लड़के को उदासीनता से देखा करती थीं। उसके पास से गुजरते हुए वे किसी भी प्रकार का भाव अभिव्यक्त नहीं करती थीं कि उसके वहाँ होने या न होने से उन्हें कोई फर्क़ पड़ता था। हालांकि उनको इतना अहसास ज़रूर हो गया था कि वह लड़का ज़रूर उनका इंतजार करता था। शायद वह अपने घर से घड़ी देखकर निकलता था और कदाचित अपने पग भी गिनकर धरता था ताकि वह ठीक उस समय उस पतली गली में पहुंचे जब वे लड़कियां भी उसी गली में आ चुकी हों।

बहुत अरसे बाद यह सिलसिला टूटा। यह शायद फरवरी के शुरुआत के दिनों की बात थी। इतवार की छुट्टी के बाद जब सोमवार को वह पतली गली में दर्ज़ी की दुकान के पास से गुजरा तो उसे सामने से एक ही लड़की आते दिखाई दी। यह लड़की बड़ी लड़की थी। छोटी लड़की उस दिन नहीं आयी। लड़के को थोड़ा धक्का लगा। जब बड़ी लड़की उसके क़रीब से निकली तो लड़का कुछ ठिठका। उसे बड़ा अज़ीब लगा। वह दोनों लड़कियों की उपस्थित का बुरी तरह से आदी हो चुका था। अगले दिन घर से निकलते समय ही उसके मन में यह बात आ गयी थी कि शायद आज वह लड़की फिर दिख जाये। पर दूसरे दिन भी बड़ी लड़की अकेली थी। छोटी लड़की नहीं थी। तीसरे दिन भी यही हुआ। बड़ी लड़की को फिर से अकेला पाकर लड़का मायूस हुआ। ठीक इसी समय लड़के को भद्दा सा ख़याल आया कि शायद छोटी लड़की के पीरियड्स चल रहे हों। चौथे या पांचवें दिन वह फिर अपनी सामान्य जिंदगी जीने लगेगी और इस गली में अपनी सहेली की साथ दिखाई देगी। पर पांचवां दिन भी गुजर गया। बड़ी लड़की अब भी अकेले ही वह पतली गली क्रॉस करती थी। लड़के का मन बहुत बेचैन हो गया। उसकी बेचैनी से दर्ज़ी का ध्यान भी टूटा। उसने लड़के की बेचैनी को नाप ले लिया था।

हालाँकि दर्ज़ी भी थोड़ा सा दुखी था। छोटी लड़की की कमी उसको भी खल रही थी। पर उसने अपने आपको अपने काम में झोंक दिया। लड़के की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। बड़ी लड़की रोज़ ठीक उसी समय पतली गली से गुजरती थी पर अकेली। उसके चेहरे पर अब कांति नहीं थी। अकेलेपन की पीड़ा उसकी आँखों में पढ़ी जा सकती थी। वह लड़के को कुछ बताना भी चाहती थी शायद पर बता नहीं पायी। लड़का भी अपने मूक होठों पर एक प्रश्न धरकर उसके पास से गुजरता था कि शायद बड़ी लड़की वह प्रश्न पढ़ले। फिर उसने वह प्रश्न अपनी आँखों में उतार लिया कि शायद बड़ी लड़की उससे कभी आँख मिलाये तो उसके प्रश्न को पढ़ ले।

छोटी लड़की को गायब हुए अब लगभग महीने भर से ज़्यादा समय बीत चुका था। बड़ी लड़की ने अपने आप को मूक कर लिया था। वह अब सर झुका कर लड़के के पास से तेजी से गुजर जाती थी। लड़का अब भी पशोपेश में था। उसे छोटी लड़की की चिंता खाये जा रही थी। उसके मन में तरह तरह के कयास आ रहे थे। उन दिनों शहर में स्वाइन फ्लू भी फैला हुआ था। लड़के को लगा कि कहीं छोटी लड़की स्वायन फ्लू से तो मर नहीं गयी। फिर उसने अपने आप को दिलासा दी कि नहीं, शहर में अच्छे अस्पताल हो गए हैं। लड़की किसी बिमारी से तो नहीं मर सकती। ज़रूर कुछ और बात है। यह भी हो सकता था कि लड़की के पिता आर्मी या किसी दूसरे विभाग में सरकारी कर्मचारी थे और उसके पिता का किसी दूसरे शहर में तबादला हो गया होगा। एक खयाल यह भी था कि लड़की की कहीं शादी ही न हो गयी हो। शहर में बालविवाह का प्रचलन भी तो था। लड़की दिखने में सुंदर थी। बदन भरा पूरा। अठारह की हुई नहीं तो क्या वह भरपूर जवान दिखती थी। शायद उसके घरवालों ने उसकी पढ़ाई छुड़ा कर उसका कहीं विवाह कर दिया होगा। लड़के के दिमाग में एक तस्वीर उभरी। छोटी लड़की अपने ससुराल के आंगन में घाघरा ओढ़नी पहने बर्तन मांझ रही थी। उसकी शिफॉन की ओढ़नी बार बार फिसल कर सर से नीचे गिर जाती थी। लड़की की सास ने उसे डाँट लगायी। ढंग से मांझो। माँ ने बर्तन मांझना सिखाया नहीं किया। ठीक से साफ़ करो। महारानी के हाथ नहीं घिस जायेंगें। धत्त। क्या क्या सोच रहा हूँ। लड़के ने अपने आपको धिक्कारा। लड़का एक सोच में डूबा हुआ था। वह एक अनजान लड़की के बारे में क्यों सोच रहा था जिसका वह नाम तक नहीं जानता था। क्या उसे उस अनाम लड़की से प्यार हो गया था। राह चलती लड़की से प्यार जिसका नाम तक नहीं पूछ पाया था वह। क्या वह लड़की अपने ससुराल में बर्तन माँजते समय उसे याद करती होगी? अगर वह उसका नाम जानती तो शायद बालू मिट्टी में अपनी अँगुलियों से उसका नाम बार बार लिखती और मिटाती रहती। लड़का उस अनामा छोटी लड़की को दिल दे बैठा था। वह उसके विरह में घुलने लगा। दो ढ़ाई महीने बीत गये उस बीच। उस पतली गली में बड़ी लड़की से उसका सामना अब भी होता था। पर उसने उस बड़ी लड़की से छोटी लड़की के बारे में कुछ नहीं पूछा। न ही उसका दिल छोटी लड़की की जगह अब बड़ी लड़की पर आया।

एक दिन लड़का स्टेशनरी की दुकान पर ड्राफ्टर ख़रीद रहा था। ड्राफ़्टर ख़रीद कर वह दुकानदार से बिल बनाने की ज़िद कर रहा था तभी उसने बगल के काउंटर पर एक लड़की को देखा। यह लड़की जानी पहचानी थी। हाँ, वह बड़ी लड़की ही थी जो उसे पतली गली में अब भी दिखती थी। उस लड़की को दुकान से साइंस लेब के लिए कुछ सामग्री ख़रीदनी थी। लड़का अपना बिल चुका कर दुकान से बाहर आ गया था। वह बाहर एक नीम के पेड़ के नीचे खड़ा हो गया। कुछ देर में लड़की भी बाहर आ गयी। लड़की को देखकर लड़का हल्का सा मुस्कुराया। लड़की भी नियंत्रित रूप से मुस्कुरायी। लड़की जैसे ही पलट कर जाने को हुई तो लड़के ने उसे रोका।
“सुनो, एक मिनट रुको,” लड़के ने कहा।
“क्या आप मुझे कुछ कह रहे हो,” लड़की ने मुड़कर पूछा। लड़की वहीं ठहर गयी। लड़का उसके क़रीब गया।
“कहिये,” लड़की ने अपनी बिदामी आँखों में कुतूहल का भाव लाकर पूछा।
“आपकी सहेली आजकल आपके साथ नहीं दिखती,” लड़के ने बिना किसी भूमिका के सीधा प्रश्न किया।
“कौनसी सहेली?” बड़ी लड़की ने अनजान होकर कहा।
“वही गोरी लड़की जो आपके साथ रूपनगर वाली गली में पहले दिखाई देती थी,” उसने कहा। गोरी शब्द का प्रयोग करते हुए लड़का थोडा जिझका था क्योंकि बड़ी लड़की सांवली थी। और उसे लगा कि शायद उसे बुरा न लग जाये। पर यह सब उसका वहम था। बड़ी लड़की ने बुरा नहीं माना।
“अब वह मेरी सहेली नहीं है। मेरी उससे कुट्टी हो गयी है। इसलिए अब वह मेरे साथ नहीं आती। एक अमीर लड़की से उसने दोस्ती कर ली है। वह अब दूसरे रास्ते से स्कूल जाती है।”
“अच्छा,” लड़के ने कहा।
“और कुछ पूछना है?” लम्बी लड़की ने कहा।
“नहीं,” लड़के ने इतना ही कहा। लड़की तुरन्त ही पोस्ट ऑफिस की तऱफ चल दी।

अगले दिन जब पतली गली में दर्ज़ी की दुकान के पास लड़के ने उस बड़ी लड़की को देखा तो वह उसे देखकर थोडा सा मुस्कुराया। लड़की भी जवाब में मुस्कुरायी। दर्ज़ी ने भी इस बदलाव को नोटिस किया। फिर यह हँसना मुस्कुराना उनकी आदत बन गयी।

लंबी पर साँवली लड़की और वह लड़का अब अक्सर स्टेशन रोड़ के पास एक रेस्तरां में देखे जाते थे।

© अजीतपाल सिंह दैया