Sunday, February 14, 2016

दो लड़कियां

यह एक छोटा सा शहर था। क्यूँ कि छोटा था तो अभी इसमें बड़े होने का ग़ुरूर नहीं था। इसका प्रमाण शहर के लोग थे। लोगों के आचरण से शहर का ग़ुरूर जाना जा सकता है। जहाँ ग़ुरूर कम रहता है वहाँ प्रेम ज़्यादा रहता है। इसलिए इस छोटे शहर के लोग बहुत संवेदनशील थे। प्रेम और भाईचारे से रहते थे। यह भाईचारा राह चलते लोगों में भी देखा जा सकता था। यहाँ राह चलते अगर किसी से थोड़ा कंधा टकरा जाए तो चार आँखें आपस में घूर कर नहीं देखती थी। आँखों में अपणायत झलकती थी। आँखें चार होती थीं। होठों पर मुस्कान उभर आती थीं। और राहें फिर गतिमान हो जाती थीं। एक राह ऐसी ही थी। इस छोटे से शहर के लगभग मध्य में। यह राह असल में एक पतली गली थी। इस राह पर एक नया राहगीर आया था। यह राह दो लम्बी गलियों को जोड़ती थी। पहले यह गली अनजानी थी। पर अब उस राहगीर के दिमाग में इस नयी राह का नक्शा भलीभांति छप गया था। अब वह आँख बन्द करके भी इस पतली गली से होकर एक लंबी गली में से होता हुआ स्टेशन रोड़ पर आकर एक स्टेशनरी की दुकान के बगल की गली से होकर हाई स्कूल तक पहुंच सकता था। यह राहगीर हाई स्कूल में पढ़ने वाला सोलह साल का एक लड़का था।

इस साल उसने हाई स्कूल में दाख़िला लिया था। दसवीं में वह गांधी चौक स्थित गांधी स्कूल में पढ़ता था। चूँकि यह स्कूल सिर्फ दसवीं तक ही थी तो उसने दसवीं उत्तीर्ण करने के बाद हाई स्कूल में दाखिला लिया था। इसलिए अब उसकी दैनिक राहें भी बदल गयी थी। ढाणी बाज़ार वाले चहल पहल वाले रास्ते की बजाय अब वह इस पतली गली से होकर जाने लगा था। इस पतली गली में लोगों की आवाजाही बहुत कम थी। वह अपने घर से निकलने के बाद क़रीब पंद्रह मिनट में इस पतली गली तक पहुँचता था। पतली गली के कॉर्नर पर एक दर्ज़ी की दुकान थी। दर्ज़ी सुबह से शाम तक अपनी सिलाई मशीन पर लगा रहता था। उसे सिलाई करना पसन्द नहीं था पर उसे इसके अलावा कोई और काम नहीं आता था। उसने पढाई में ध्यान नहीं दिया था। हालाँकि उसके पिता ने उसे पढ़ाने की भरपूर कोशिश की थी पर उसे गणित और अंग्रेजी बिलकुल नहीं आती थी। हारकर उसने पढ़ाई छोड़ दी और इस दुकान पर बैठने लग गया। यह दुकान पहले उसके चाचा चलाते थे।

दर्ज़ी स्कूल के बच्चों की नेकरें सिलता था। लड़के को उस दर्ज़ी पर दया आती थी। दिन भर बिचारा नेकरें सीता है। एक दिन जब वह दर्ज़ी की दुकान के क़रीब से गुजर रहा था तो उसका कंधा एक राहगीर से टकरा गया। यह एक एक्सीडेंट था। उसका कारण भी यही था कि वह उस समय भी दर्ज़ी की दुर्दशा के बारे में सोच रहा था। बहरहाल, जिस कंधे से उसका कंधा टकराया वह कंधा एक लड़की का था। उसने हड़बड़ा कर उधर देखा। उस लड़की ने कुछ नहीं कहा। मुस्कुरायी भी नहीं। वह सॉरी कहना चाहता था पर वह कुछ सुनना ही नहीं चाहती थी। कंधे से कंधे टकराने से लड़की की चाल में बस कुछ पल का व्यवधान हुआ। वह तुरन्त सम्भल गयी थी और आगे बढ़ गयी जैसे कि कुछ हुआ ही नहीं। असल में वह लड़की अकेली नहीं थी। उसके साथ एक लड़की और थी। दोनों लड़कियां एक जैसी गणवेश पहने थी। सफ़ेद सलवार और आसमानी कुरता। उनकी चुन्नी का रंग भी सफ़ेद था। चुन्नी को उन्होंने अपने वक्ष पर वी बनाकर गले से होते हुए पीठ पर लटकाये रखा था। दोनों के कदों में काफी फर्क़ था। लम्बे कद वाली लड़की दूसरी लड़की से दो या तीन इंच लम्बी रही होगी। इन लड़कियों का वहाँ से गुजरना शायद दर्ज़ी भी नोटिस करता था। लड़के को लगा कि वह दर्ज़ी ठीक उसी समय अपनी सिलाई मशीन से ध्यान हटाकर दुकान से बाहर झांकता था। वह आँखों ही आँखों में बिना अपने इंची फ़ीते के उन लड़कियों के सलवार की लम्बाई, नितम्ब और क़मर का घेरा एवं वक्षों की परिधि नाप लेता था। यह उस लड़के का ख़याल था। उसने दर्ज़ी को मन ही मन कोसा और आगे बढ़ गया।

अगले दिन। जब वह ठीक उसी समय पतली गली से दर्ज़ी की दुकान के सामने से गुजर रहा था तो उसने सामने से आती उन दो लड़कियों को देखा। ये वे ही लड़कियां थीं जिन्हें उसने कल एक झलक देखा था। आज उसने दोनों लड़कियों को अच्छे से देख लिया था। दोनों लड़कियों की छवियाँ उसने अपने मस्तिष्क में अंकित कर ली। लड़कियां आज भी अपनी गणवेश में थीं। सफ़ेदझक सलवार और आसमानी कुरता। आसमानी कुरता इतना आसमानी था कि लगता था कि किसी दर्ज़ी ने आसमान को कैंची से काटकर सिला हो। पर यह इस पतली गली वाले दर्ज़ी के बस की बात नहीं थी। यह दर्ज़ी केवल ख़ाकी नेकरें ही सिला करता था।

लड़कियों की झीनी सफ़ेद चुन्नी बड़े करीने से उनके बदन पर लिपटीं रहती थी। आज उसने लड़कियों के चेहरों को भी अच्छी तरह देख लिया था। लम्बी लड़की का रंग सांवला था। नाक तीखी। पतले होंठ। होंठों का रंग हल्का गुलाबी। आँखे बिदामी। आइब्रो गहरे काले। कान थोड़े से दबे हुए पर सफ़ेद मोती वाला लूँग दोनों कानों में। दिखने में भली ही दिखती थी। मुस्कुराहट पर पूरा नियंत्रण। उसकी इज़ाज़त की बिना दोनों होंठ बिलकुल अनुशासित सिपाही की तरह अपनी जगह पर क़ायम। छोटी लड़की केवल लम्बाई में ही छोटी थी अन्यथा दोनों हम उम्र थीं और एक ही कक्षा में पढ़ती थीं। छोटी लड़की लम्बी लड़की से थोड़ी ज़्यादा आकर्षक थी। लम्बे बाल थे उसके। लम्बी लड़की के बालों से भी अधिक लम्बे। वह लम्बी चोटियां करती थीं। उसकी चोटियों में दो नीले रिबन तितलियों की भांति लगतीं थीं। छोटी लड़की का चेहरा कोणीय था। ठुड्डी थोड़ी तीखी। नाक दरमियाना पर थोड़ी उठी हुई। होंठ जरा से मोटे पर बिलकुल गुलाब की दो पंखुरियों जैसे खूबसूरत। लड़की गोरी थी तो उसके गुलाबी होंठ और भी निखर गए थे। आँखें गहरी काली और चंचल हिरणी की आँखों जैसी। कान बड़े पर चेहरे के बिलकुल अनुपात में। कानों में यह लटकनें पहनती थी अलग अलग रंगों की। मूँगिया रंग की लटकनों में उसके कान ज़्यादा सुन्दर दिखते थे। दोनों लड़कियां जब गली में सामने से आती थी तो आपस में हंसी ठिठोली करते हुए आती थी। ठिठोली की पहल आमतौर पर छोटी लड़की करती थी क्योंकि वह चंचल थी। लंबी लड़की को सुविधा के लिए हम बड़ी लड़की कह लेते हैं। तो बड़ी लड़की गंभीर थी पर वह उसकी ठिठोली में शामिल हो जाती थी। हालाँकि वह अपने दोनों होठों को थोड़ा कस लेती थी ताकि ज़्यादा नहीं हंस सके। शायद कम हँसना उसे विरासत में सिखाया गया था।

छोटी लड़की उच्छंखृल थी। वह खुल कर हँसती थी। वह जब हंसती थी तो बड़ी लड़की की तरह अपने होंठों को भींचती नहीं थी। हँसते समय सुंदर और सफ़ेद दांत दिखते थे उसके। शायद वह वही मंजन करती थी जो राजू करता था। राजू वही लड़का था जो टीवी पर आता था और उसके मास्टरजी उसे कहते थे कि राजू तुम्हारे दांत तो मोतियों से चमक रहे हैं। एक और फर्क़ दोनों लड़कियों में था। बड़ी लड़की कुछ जिम्मेदार किस्म की थी। इसी जिम्मेदारी के बोझ से उसके कंधे हल्के से दबे हुए थे। छोटी लड़की बेपरवाह थी। उसके कंधे भी बेपरवाह थे। उसी बेपरवाही के कारण उसके कंधे लड़के के कंधे से टकराये थे। लड़का दोनों लड़कियों से सम्मोहित था। बदकी लड़की जो लम्बी और सांवली थी, में अलग सम्मोहन था तो छोटी और गोरी लड़की में भी एक अलग सम्मोहन था। पर वह छोटी लड़की के प्रति ज़्यादा सम्मोहित था। बड़ी लड़की का कद करीब क़रीब लड़के के कद के आसपास ही था या वह कम से कम लड़के के कान की ऊपरी किनारी तक लम्बी तो थी ही। छोटी लड़की लड़के के कान के कुछ नीचे तक आती होती होगी। अब एक लड़का, दो लड़कियों और दर्ज़ी उस पतली गली के अनिवार्य हिस्से बन गए थे। सभी एक दूसरे की दिनचर्या में शामिल हो गए थे खासकर उन लम्हों में जब वे तीनों दर्ज़ी की दुकान के आसपास होते थे। लड़कियां उस लड़के के बारे में सोचती थीं या नहीं ठीक से नहीं कहा जा सकता पर इतना जरूर तय था कि वे उसको रोज़ गली में ठीक उसी समय देखतीं ज़रूर थीं। और यह दृश्य उनके आँखों में अनिवार्यत क़ैद होता था। इतवार इसका अपवाद था। इतवार को दोनों लड़कियां ठीक इस समय कहाँ होती थी किसी को नहीं मालूम था। वे अपने घर पर होती थीं या अपनी नानी के घर चली जाती थीं या फिर दोनों ही किसी तीसरी लड़की के घर जाकर गड्डे खेला करती थीं। कोई नहीं जानता था। इतवार के बारे में यह भ्रम बना हुआ था।

पर शनिवार रंगीन होता था। मतलब यह कि शनिवार को लड़कियां ठीक उसी समय पतली गली में होती थीं पर इस दिन उनकी पोशाक सफ़ेद सलवार और आसमानी कुरता नहीं होता था। इस दिन वे अपनी मर्जी की मालिक होती थीं। वे रंगीन लिबास में होती थीं। रंगीन कपड़ों में दोनों और भी ज़्यादा सुंदर दिखतीं थीं। लम्बी पर सांवली लड़की अपने ऊपर फबने वाले लिबास पहनती थी। उसका ड्रेसिंग सेंस अच्छा था। उसे मालूम था कि उसके सांवले रंग पर कौनसे रंग का कपड़ा अच्छा लगेगा। यह सेंस उसको जन्म से ही था या उसकी माँ ने सिखाया था नहीं मालूम। पर हर शनिवार को वह अपने रंगीन लिबास में अपने सांवलेपन के बावजूद अधिक आकर्षक नज़र आती थी। छोटी लड़की को कोई विशेष ड्रेसिंग सेंस नहीं था। पर उसकी यह कमी उसका गोरा रंग ढंग ढांप देता था। उसको अपना लिबास चुनने में कोई ख़ास मेहनत नहीं करनी पड़ती थी। कोई भी रंग उसको सूट कर जाता था। हालांकि वह हरे रंग में ज़्यादा सुंदर दिखती थी। यह बात उसे शायद मालूम नहीं थी। नहीं तो उसके वार्डरॉब में हरे रंग के कपड़े ज़्यादा होते। उसके पास असल में हर रंग के कपड़े थे। उसकी रंगों में कोई ख़ास पसन्द या नापसंद नहीं थी। पर जब वह हरे रंग का सूट पहन कर आती थी तो कसम से बड़ी लड़की भी उसकी सराहना करती थी। उस दर्प से छोटी लड़की की आँखों में चमक आ जाती थी। उस चमक से वह लड़का भी चुंधिया जाता था।

अब इस सिलसिले को काफी वक़्त हो गया था। दर्ज़ी अपनी दुकान पर हमेशा की तरह व्यस्त रहता था। ख़ाकी नेकरों के साथ साथ अब उसने नीली पतलूनों की सिलाई भी शुरू कर दी थी। अब वह सिलाई मशीन से सिर उठा कर बाहर कम ही देखता था। उधर वह गली उस लड़के और दोनों लड़कियों से अच्छी तरह आशना हो गयी थी। जब उस लम्हे तीनों एक साथ गली से गुज़रते थे तो गली में एक प्रकार की खुशबू हवा में फैल जाती थी। यह खुशबू एक सेंट की थी। यह सेंट कौनसी लड़की लगाती थी नहीं मालूम। दोनों लड़कियां अभी भी उस लड़के को उदासीनता से देखा करती थीं। उसके पास से गुजरते हुए वे किसी भी प्रकार का भाव अभिव्यक्त नहीं करती थीं कि उसके वहाँ होने या न होने से उन्हें कोई फर्क़ पड़ता था। हालांकि उनको इतना अहसास ज़रूर हो गया था कि वह लड़का ज़रूर उनका इंतजार करता था। शायद वह अपने घर से घड़ी देखकर निकलता था और कदाचित अपने पग भी गिनकर धरता था ताकि वह ठीक उस समय उस पतली गली में पहुंचे जब वे लड़कियां भी उसी गली में आ चुकी हों।

बहुत अरसे बाद यह सिलसिला टूटा। यह शायद फरवरी के शुरुआत के दिनों की बात थी। इतवार की छुट्टी के बाद जब सोमवार को वह पतली गली में दर्ज़ी की दुकान के पास से गुजरा तो उसे सामने से एक ही लड़की आते दिखाई दी। यह लड़की बड़ी लड़की थी। छोटी लड़की उस दिन नहीं आयी। लड़के को थोड़ा धक्का लगा। जब बड़ी लड़की उसके क़रीब से निकली तो लड़का कुछ ठिठका। उसे बड़ा अज़ीब लगा। वह दोनों लड़कियों की उपस्थित का बुरी तरह से आदी हो चुका था। अगले दिन घर से निकलते समय ही उसके मन में यह बात आ गयी थी कि शायद आज वह लड़की फिर दिख जाये। पर दूसरे दिन भी बड़ी लड़की अकेली थी। छोटी लड़की नहीं थी। तीसरे दिन भी यही हुआ। बड़ी लड़की को फिर से अकेला पाकर लड़का मायूस हुआ। ठीक इसी समय लड़के को भद्दा सा ख़याल आया कि शायद छोटी लड़की के पीरियड्स चल रहे हों। चौथे या पांचवें दिन वह फिर अपनी सामान्य जिंदगी जीने लगेगी और इस गली में अपनी सहेली की साथ दिखाई देगी। पर पांचवां दिन भी गुजर गया। बड़ी लड़की अब भी अकेले ही वह पतली गली क्रॉस करती थी। लड़के का मन बहुत बेचैन हो गया। उसकी बेचैनी से दर्ज़ी का ध्यान भी टूटा। उसने लड़के की बेचैनी को नाप ले लिया था।

हालाँकि दर्ज़ी भी थोड़ा सा दुखी था। छोटी लड़की की कमी उसको भी खल रही थी। पर उसने अपने आपको अपने काम में झोंक दिया। लड़के की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। बड़ी लड़की रोज़ ठीक उसी समय पतली गली से गुजरती थी पर अकेली। उसके चेहरे पर अब कांति नहीं थी। अकेलेपन की पीड़ा उसकी आँखों में पढ़ी जा सकती थी। वह लड़के को कुछ बताना भी चाहती थी शायद पर बता नहीं पायी। लड़का भी अपने मूक होठों पर एक प्रश्न धरकर उसके पास से गुजरता था कि शायद बड़ी लड़की वह प्रश्न पढ़ले। फिर उसने वह प्रश्न अपनी आँखों में उतार लिया कि शायद बड़ी लड़की उससे कभी आँख मिलाये तो उसके प्रश्न को पढ़ ले।

छोटी लड़की को गायब हुए अब लगभग महीने भर से ज़्यादा समय बीत चुका था। बड़ी लड़की ने अपने आप को मूक कर लिया था। वह अब सर झुका कर लड़के के पास से तेजी से गुजर जाती थी। लड़का अब भी पशोपेश में था। उसे छोटी लड़की की चिंता खाये जा रही थी। उसके मन में तरह तरह के कयास आ रहे थे। उन दिनों शहर में स्वाइन फ्लू भी फैला हुआ था। लड़के को लगा कि कहीं छोटी लड़की स्वायन फ्लू से तो मर नहीं गयी। फिर उसने अपने आप को दिलासा दी कि नहीं, शहर में अच्छे अस्पताल हो गए हैं। लड़की किसी बिमारी से तो नहीं मर सकती। ज़रूर कुछ और बात है। यह भी हो सकता था कि लड़की के पिता आर्मी या किसी दूसरे विभाग में सरकारी कर्मचारी थे और उसके पिता का किसी दूसरे शहर में तबादला हो गया होगा। एक खयाल यह भी था कि लड़की की कहीं शादी ही न हो गयी हो। शहर में बालविवाह का प्रचलन भी तो था। लड़की दिखने में सुंदर थी। बदन भरा पूरा। अठारह की हुई नहीं तो क्या वह भरपूर जवान दिखती थी। शायद उसके घरवालों ने उसकी पढ़ाई छुड़ा कर उसका कहीं विवाह कर दिया होगा। लड़के के दिमाग में एक तस्वीर उभरी। छोटी लड़की अपने ससुराल के आंगन में घाघरा ओढ़नी पहने बर्तन मांझ रही थी। उसकी शिफॉन की ओढ़नी बार बार फिसल कर सर से नीचे गिर जाती थी। लड़की की सास ने उसे डाँट लगायी। ढंग से मांझो। माँ ने बर्तन मांझना सिखाया नहीं किया। ठीक से साफ़ करो। महारानी के हाथ नहीं घिस जायेंगें। धत्त। क्या क्या सोच रहा हूँ। लड़के ने अपने आपको धिक्कारा। लड़का एक सोच में डूबा हुआ था। वह एक अनजान लड़की के बारे में क्यों सोच रहा था जिसका वह नाम तक नहीं जानता था। क्या उसे उस अनाम लड़की से प्यार हो गया था। राह चलती लड़की से प्यार जिसका नाम तक नहीं पूछ पाया था वह। क्या वह लड़की अपने ससुराल में बर्तन माँजते समय उसे याद करती होगी? अगर वह उसका नाम जानती तो शायद बालू मिट्टी में अपनी अँगुलियों से उसका नाम बार बार लिखती और मिटाती रहती। लड़का उस अनामा छोटी लड़की को दिल दे बैठा था। वह उसके विरह में घुलने लगा। दो ढ़ाई महीने बीत गये उस बीच। उस पतली गली में बड़ी लड़की से उसका सामना अब भी होता था। पर उसने उस बड़ी लड़की से छोटी लड़की के बारे में कुछ नहीं पूछा। न ही उसका दिल छोटी लड़की की जगह अब बड़ी लड़की पर आया।

एक दिन लड़का स्टेशनरी की दुकान पर ड्राफ्टर ख़रीद रहा था। ड्राफ़्टर ख़रीद कर वह दुकानदार से बिल बनाने की ज़िद कर रहा था तभी उसने बगल के काउंटर पर एक लड़की को देखा। यह लड़की जानी पहचानी थी। हाँ, वह बड़ी लड़की ही थी जो उसे पतली गली में अब भी दिखती थी। उस लड़की को दुकान से साइंस लेब के लिए कुछ सामग्री ख़रीदनी थी। लड़का अपना बिल चुका कर दुकान से बाहर आ गया था। वह बाहर एक नीम के पेड़ के नीचे खड़ा हो गया। कुछ देर में लड़की भी बाहर आ गयी। लड़की को देखकर लड़का हल्का सा मुस्कुराया। लड़की भी नियंत्रित रूप से मुस्कुरायी। लड़की जैसे ही पलट कर जाने को हुई तो लड़के ने उसे रोका।
“सुनो, एक मिनट रुको,” लड़के ने कहा।
“क्या आप मुझे कुछ कह रहे हो,” लड़की ने मुड़कर पूछा। लड़की वहीं ठहर गयी। लड़का उसके क़रीब गया।
“कहिये,” लड़की ने अपनी बिदामी आँखों में कुतूहल का भाव लाकर पूछा।
“आपकी सहेली आजकल आपके साथ नहीं दिखती,” लड़के ने बिना किसी भूमिका के सीधा प्रश्न किया।
“कौनसी सहेली?” बड़ी लड़की ने अनजान होकर कहा।
“वही गोरी लड़की जो आपके साथ रूपनगर वाली गली में पहले दिखाई देती थी,” उसने कहा। गोरी शब्द का प्रयोग करते हुए लड़का थोडा जिझका था क्योंकि बड़ी लड़की सांवली थी। और उसे लगा कि शायद उसे बुरा न लग जाये। पर यह सब उसका वहम था। बड़ी लड़की ने बुरा नहीं माना।
“अब वह मेरी सहेली नहीं है। मेरी उससे कुट्टी हो गयी है। इसलिए अब वह मेरे साथ नहीं आती। एक अमीर लड़की से उसने दोस्ती कर ली है। वह अब दूसरे रास्ते से स्कूल जाती है।”
“अच्छा,” लड़के ने कहा।
“और कुछ पूछना है?” लम्बी लड़की ने कहा।
“नहीं,” लड़के ने इतना ही कहा। लड़की तुरन्त ही पोस्ट ऑफिस की तऱफ चल दी।

अगले दिन जब पतली गली में दर्ज़ी की दुकान के पास लड़के ने उस बड़ी लड़की को देखा तो वह उसे देखकर थोडा सा मुस्कुराया। लड़की भी जवाब में मुस्कुरायी। दर्ज़ी ने भी इस बदलाव को नोटिस किया। फिर यह हँसना मुस्कुराना उनकी आदत बन गयी।

लंबी पर साँवली लड़की और वह लड़का अब अक्सर स्टेशन रोड़ के पास एक रेस्तरां में देखे जाते थे।

© अजीतपाल सिंह दैया

Tuesday, December 8, 2015

एक लघु प्रेम कथा- ‘भाग्यश्री अपार्टमेंट्स’

-कल से दूसरा ठिकाना ढूँढना पड़ेगा।

-क्यूँ?

-तुम्हें नहीं मालूम। यहाँ का ठेकेदार चेंज हो गया है। और हमारा काम भी तो पूरा हो गया है। इतनी बड़ी इमारत खड़ी हो गयी है।

-तो नया ठेकेदार हमें नहीं रख सकता?

-पगली, हम कन्स्ट्रक्शन करने वाले मजदूर हैं। अब फिनिशिंग का काम शुरू होगा।

-कुछ दिनों में वह भी खत्म हो जायेगा। फिर बिल्डिंग बस जायेगी।

-हाँ, और बाहर खड़ा लम्बी लम्बी मूंछों वाला दरबान हमें आसपास भी फटकने नहीं देगा।

-हाँ।

-कितनी अजीब बात हैं, दीनू? हमारी मेहनत और पसीने से यह ऊँचा कॉम्लेक्स बनकर तैयार हुआ है। ईंटों को जोड़ने वाले इस गारे में सीमेंट, कंकरी और पानी ही नहीं बल्कि तेरा मेरा और हमारे जैसे बाकी लोगों के बदन से टपका पसीना भी शामिल है।

-खाली पसीना क्यूँ। तुम्हारे लहू की बूंदे भी तो है। उस दिन तुम्हारे सर पर जो ईंट गिर गयी थी। कितना खून बहा था?

-हाँ, सही कहते हो। उस दिन तुम ठेकेदार से लड़कर मुझे टेम पर अस्पताल ले न जाते तो मैं तो रामजी के घर पहुंच ही जाती।

-अरे, नहीं रे। गरीब ही गरीब के काम आता है।

-तुम कितने अच्छे हो।

-तुम भी।

-सुनो, पास आ जाओ न। इस बिल्डिंग में शायद यह हमारी आखरी रात हो।

-नहीं नहीं, मैं ठीक हूँ यहीं पर।

-चल तू नहीं आता तो मैं ही आ जाती हूँ।


*****

-तुम्हारा बदन लोहे की तरह है रे। क्या खाते हो?

-खाने का क्या? जो भी मिल जाता है खा लेता हूँ। अब इत्ती सी मजूरी में कोई बिदाम थोड़ी ही खा सकता हूँ। और बदन का क्या है? अभी तो जवान हूँ। ईंटे उठाकर ऊपर नीचे चढ़ने से तगड़ी वर्ज़िश हो जाती है।

-तुम्हारी पतली पतली मूँछे जंचती है तुम्हारे होंठों पर।

-अरे, थोडा दूर रहो मुझसे।

-क्यों क्या हुआ। छी! तुम्हारा मुंह बॉस रहा है। दारू पी है?

-नहीं तो।

-झूठ मत बोलो। मैं पहचानती हूँ इस गंध को। मेरा बाप मर गया था दारू पी पी कर। माँ को हम तीन भाई बहनों के साथ बेसहारा छोड़ कर।

-मजूरी करते थे?

-नहीं, थोड़ी बहुत खेती बाड़ी थी गांव में।

-फिर?

-छोड़ो भी अब। तुम इतनी छानबीन क्यों कर रहे हो? जोरू बनाएगा क्या मुझको?

-तुम्हीं ने तो अपने बाप की बात छेड़ी थी।

-ठीक है, ठीक है। ......तुम्हारे हाथ पर सर रखने दो। फ़र्श चुभ रहा है।

-अरे हटो। सट मत। कोई ऊँच नीच हो जायेगी।

****

-दीनू यह तूने क्या किया?

-मैं क्या करूँ? मैंने कहा था न, वहीँ सो जाओ अपनी जगह पर। क्यूँ आयी इधर? चिमट चिमट कर सो रही थी।

-भूल हो गयी। पर मुझे डर रहा है।

-क्यूँ?

-कुछ हो गया तो?

-कुछ नहीं होगा?

-फिर भी।

-देखा जायेगा।

-दीनू, मुझे लड़की पसंद है। अगर लड़की हो गयी तो हम उसका क्या नाम रखेंगें?

-रख लेना कुछ भी।

-कुछ भी नहीं। ऐसा नाम बताओ जो हमेशा याद रहे।

-भाग्यश्री कैसा है?

-रामा रे। बहुत ही अच्छा। कहाँ से सोचा इतना प्यारा नाम?

-आसान था। जिस बिल्डिंग में अभी हम सो रहे हैं, इसका ही तो नाम है-भाग्यश्री अपार्टमेंट्स।

-सचमुच दीनू। तूने तो यादगार नाम दिया है रे। पता है, मुझे क्या लग रहा है? कि इस बिल्डिंग के असली मालिक तो हम लोग ही हैं।

-मालिक?

-क्यूँ नहीं? हमारा घर जो बस गया है इसमें।

-पर हमारा ब्याह कहाँ हुआ है री?

-हो तो गया। और कुछ बाकी है क्या?

-कोई गवाह तो नहीं था?

-था तो।

-कौन?

-उस कोने में टाट पर जो काली बिल्ली सो रही है, उसने सब देखा है।

-पर वोह तो सो रही थी।

-रामजी ने देखा था। वो तो नहीं सोये थे।

-क्या सचमुच रामजी ने देखा था सब? छी, फिरसे मत बोलो। मुझे शरम आ रही है।

-तू और शरम।

-हट ना।

-अच्छा यह बता। भाग्यश्री नहीं हुई और कोई लड़का हो गया तो। तो क्या नाम रखोगी तुम?

-सलमान दीनानाथ यादव।

-वाह री। पर कुछ अलग टाइप का नही है। मुसलमान और हिन्दू का नाम एक साथ।

-गरीब का कोई धरम वरम नहीं होता है रे। हमें थोड़ी ही जाना है कोई मंदिर मस्जिद।

-तुम तो बड़ी समझ दार हो। तुम सलमान को जानती हो? सिनेमा देखा है क्या?

-हाँ, बनारस में देखा था। सलमान खान की फिल्लम। मैंने प्यार किया।

-वाह, ए सुन,चल एक बार फिर करते हैं।

-क्या?

-प्यार।

-चुप, छोड़ो मुझे। वरना शोर मचा दूँगीं।

(चमेली यादव के कृत्रिम प्रतिरोध ने कुछ ही क्षणों मे समर्पण कर दिया। काली बिल्ली को शर्म आ गयी और वह धीरे से उठकर, अंधेरे में गुम हो गयी।)


©अजीतपाल सिंह दैया

Monday, December 7, 2015

एक लघु प्रेम कथा- ‘दिल्ली’

-तुम्हें ज़्यादा चर्बी चढ़ी थी देशभक्ति की। क्या जरूरत थी जॉब छोड़ने की?
-ऐसे मत कहो। इट वाज़ फॉर अ चेंज। हमें इंडिया बदलना था। अन्ना के काम को आगे बढ़ाना था।
-तुम क्या सोचते थे? जंतर मन्तर पर तुम्हारे धरना देने से कोई जंतर हो जायेगा। देश की तकदीर बदलने लगेगी रातों रात।
-रातों रात कुछ नहीं बदलता है। पर कहीं तो शुरुआत करनी पड़ती है न। अन्ना और केजरीवाल एक महायज्ञ कर रहे थे। मैं कैसे पीछे रहता।
-और तुमने उनके इस महायज्ञ में अपनी एमएनसी की अच्छी भली नौकरी छोड़ की आहुति दे दी।
-एक करप्शन फ्री कंट्री के लिये यह एक बहुत मामूली चीज़ थी।
-कुछ बदलेगा?
-जरूर। तुम देखती जाना।

*****

-सुना तुमने, केजरीवाल और अन्ना अलग हो गये हैं।
-हाँ।
-अब क्या होगा तुम्हारे इंडिया अगेंस्ट करप्शन का?
-चलेगा यूँ ही आगे। जब तक कंट्री करप्शन फ्री न हो जाये।
-तुम्हें नहीं लगता केजरीवाल ने पॉलिटिकल पार्टी बना कर अन्ना के साथ विश्वासघात किया है।
-नहीं, दोनों अपनी अपनी जगह ठीक हैं। पॉलिटिक्स को पॉलिटिक्स से ही बदला जा सकता है। हम नयी तरह की राजनीति करेंगें।
-तुम कबसे केजरीवाल की भाषा बोलने लग गये।
-सिस्टम को सिस्टम के बाहर रह कर नहीं बदला जा सकता। हमें सिस्टम के अंदर घुसना पड़ेगा। तभी हम करप्शन पर लग़ाम लगा पाएंगे। आम आदमी पार्टी में साफ़ सुथरे लोगों की एंट्री होगी। तुम देखना।
-हाँ देखती हूँ। तुम कैसे राजनीति चेंज करते हो?
-हम जरूर बदलेंगे। इसकी शुरुआत दिल्ली से होगी। हमें आम आदमी का समर्थन है।

*****

-यार, मुझे कतई उम्मीद नहीं थी। तुम लोग सत्ताईस सीटें जीत जाओगे।
-सच कहूँ, उम्मीद तो मुझे भी नहीं थी।
-पर तुम्हारी यह अल्पमत सरकार चलेगी कितना दिन? और बिना पर्याप्त समर्थन के कैसे लागू करोगे अपनी नीतियां।
-हमारी प्राथमिकता लोकपाल को लागू करवाना है।
-कैसे करवाओगे। दोनों ही प्रमुख पार्टियां नहीं चाहती। मेरी मानो तो आप लोगों को पहले दूसरे मुद्दों पर कुछ काम करके दिखाना चाहिए। लोकपाल की ढपली का राग अलापने से कुछ हासिल न होगा।
-हम लोकपाल को नहीं छोड़ सकते। इंडिया अगेंस्ट करप्शन के लिये यह हमारा बुनियादी हथियार है।
-लो सुनो। आई हेव जस्ट रिसिव्ड दिस मैसेज ऑन व्हाट्सऐप कि….
-क्या?
-तुम्हारे केजरीवाल की 49 दिन की सरकार ने लोकपाल को लेकर इस्तीफ़ा दे दिया है। अब बोलो।
-बोलना क्या है? केजरीवाल ने कुछ सोच समझ कर ही यह कदम उठाया होगा। अगले चुनाव में हमारी पूर्ण सरकार बनेंगी।
-आर यू स्योर? तुम 27 सीटें भी बचा पाओगे। मुझे नहीं लगता।
-नहीं। दिल्ली की जनता चेंज चाहती है। हमारी पूर्ण बहुमत की सरकार बनेगी।
-अच्छा। आल द बेस्ट।

*****

-कितने महीने गुजर गए। तुम्हारी पूर्ण बहुमत की सरकार को दिल्ली पर राज करते। मुझे तो कुछ चेंज नहीं लग रहा है।
-चेंज हो रहा है। धीरे धीरे सामने आयेगा।
-तुम्हारे केजरीवाल तो बोलते थे कि हम अलग तरह की राजनीति करने आएं हैं। यही है तुम लोगों की सबकी तरह की अलग राजनीति। मुझे तो तुम लोग भी उसी थैली के चट्टे बट्टे बन गये लगते हो।
-हूँ।
-तर्क नही है अब तुम्हारे पास क्या? अच्छा यह बताओ। जिस लोकपाल को लेकर तुम्हारे केजरीवाल ने 49 दिनों में इस्तीफा दे दिया था। अभी तक क्यूँ नहीं लाये हो उस लोकपाल को जिसकी धुन पर तुम लोग नागिन डांस कर रहे थे।
-छोड़ों न अब इन बातों को।
-क्यूँ जवाब देते नहीं बन रहा है? सांप सूंघ गया है क्या? तुम्हारी सरकार के मंत्री एक एक कर जेल जा रहे हैं या इधर उधर भाग रहे हैं। कैसे चेंज करोगे सिस्टम को यार तुम लोग? अब यह मत बोलना कि साज़िश है यह अपोजिशन की। हमें काम नहीं करने दिया जा रहा है।
-क्या हम अपोलोटिकल नहीं हो सकते? हर समय यही बातें किया करते हैं, जब भी मिलते हैं।
-अच्छा नहीं करती। यह बताओ, तुम्हारे अकाउंट में कितने पैसे हैं? बचे भी हैं या जगह जगह उधारी चढ़ा दिये हो!
-नहीं नहीं। पड़े हैं कुछ पैसे अभी।
-देखो झूठ मत बोलो। फलाना एमएनसी के एक्स डिप्टी मैनेजर, मुझे नहीं लगता। क्या मुझे नहीं मालूम कि तुम कितना सैलरी पाते थे। मैं बात करूँ क्या, बॉस से। तुम फिर से यहां ज्वाइन कर लो। फिर से असिस्टेंट मैनेजर से शुरू करना पड़ेगा। नहीं तो अब तक सीनियर मैनेजर हो लिए होते।
-क्या फर्क़ पड़ता है?
-मतलब अभी तुम्हारा पॉलिटिक्स का भूत उतरा नहीं है। रुको, रुको। बिल में पे करती हूँ।
-नहीं, मैं देता हूँ न।
-क्यों, लड़की के पैसों से डिनर खाना अच्छा नहीं लगता क्या?
-नहीं, ऐसी बात नहीं है।
-अच्छा यह बताओ। तुम्हारे फ्लैट का भाड़ा कितने दिनों से बकाया है? सच बोलना।
-पांच महीने हो गए।
-यह लो मेरा डेबिट कार्ड। कल अपना सारा कर्ज़ा चुकता कर देना।
-नहीं नहीं। यह ठीक नहीं है।
-प्लीज, मेरी रिकेस्ट है। मैं नहीं चाहती कि तुम अपने सर पर इतनी देनदारियां लेकर फिरो।
-अच्छा।
-एक बात और। मानोगे।
-पहले बताओ तो।
-तुम गुड़गांव वाला अपना फ्लैट खाली कर दो। मेरे फ्लैट में शिफ्ट हो जाओ। आजकल मैं अकेली रह रही हूँ। मीरा मुंबई चली गयी है। प्लीज, कम विद मी। मुझे अच्छा लगेगा। एन्ड द अदर थिंग। इफ यू डोंट वांट टू ज्वाइन बेक दिस कम्पनी, देन आल्सो द्वारका इज़ नियरर टू जन्तर मन्तर। यू केन कंटिन्यू विद योर इंडिया अगेंस्ट करप्शन कैम्पेन। आइ ठु वांट ए चेंज, यार। मुझे इंतज़ार है उस दिन का। व्हेन, अवर कंट्री शैल बी टोटल करप्शन फ्री।
-अब, मैं एक बात कहूँ।
-क्या?
-आइ लव यू, अवंतिका।
-शट अप, अर्जुन।

© अजीतपाल सिंह दैया

Saturday, October 17, 2015

एक लघु प्रेम कथा- ‘माउंट आबू’

-ए सुनो, अगर हम भी ऐसे ही करेंगे तो उनमें और हम में फर्क क्या रहेगा?
-किनमें?
-उधर देखो, एक ही स्ट्रा से नारियल पानी पी रहे हैं।
-यू मीन पब्लिक डिसप्ले ऑफ़ अफेक्शन।
-हाँ, पर उसमें तो कुछ और भी किया जा सकता है।
-मैं उस हद तक नहीं जा सकता।
-पर कुछ तो हम भी कर सकते हैं। चल एक ही केन से मुंह लगा कर कोक पिया जाये। या पिज़्ज़ा खाते हैं। एक कोर तुम एक कोर मैं।
-पर यह भी तो घिसा पिटा ही फार्मूला है। बल्कि अमीर लौंडे-लौंडियों की चोंचला टाइप हरकतें हैं। रोज ही तो देखता हूँ अपने अहमदाबाद में लॉं गार्डन पर।
-तो नया क्या करें क़ि यह नक्की झील हमें हमेशा याद करें। मतलब मैं तुम और हमारा प्रेम।
-उसके लिए तो मुमताज़ और शाहजहाँ बनना पड़ता है। मुमताज़ मरेगी तो ताजमहल खड़ा होगा।
-व्हाट डू यू मीन। शेल आई ड्रोन इन दिस लेक। डूब कर मर जाऊँ यहाँ।
-नहीं बाबा, मेरा या मतलब नहीं था। और डूबना ही है तो माउंट आबू में क्यूँ? तुम्हारी रूह नक्की झील में भटकती रहेगी। वैसे कांकरिया झील भी सुंदर जगह है।
-किस लिए?
-डूबने के लिए।
-चल हट। मैं क्यू डूबूँ। अच्छा, तुम्हें मालूम है, ताजमहल के बारे में किसी ने क्या कहा है?
-किसने ?
-किसने क्या? साहिर लुधियानवी ने।
-क्या कहा था?
-यही कि एक शहँशाह ने हसीं ताजमहल बनाकर हम गरीबों की मुहब्बत का उड़ाया था मज़ाक।
-तो ऐसा करो न, तुम भी उड़ाओ अमीरों की मुहब्बत का मज़ाक।
-ग्रेट। लेट मी थिंक। अच्छा तुम यहीं ठहरो। मैं अभी आती हूँ। सुनो, उस नीले दुपट्टे वाली की तरफ ध्यान मत दो। मैं देख रही हूँ कि तुम्हारा ध्यान बार बार उधर जा रहा है।

-चल, अब कुछ मटरगश्ती करें।
-मतलब?
-मतलब क्या? झील के किनारे किनारे चलो मेरे साथ। ये मटर रखो। छील छील कर एक दूसरे को खिलाएँगे।
-मतलब, यही तुम्हारी मटरगश्ती है।
-लो यह लाल टमाटर भी पकड़ो।
-इसका क्या करूँ?
-पहले कुछ रस तुम चूसो। फिर तुम्हारे झूठे टमाटर का रस मैं चूसुंगी।
-आर यू सिल्ली? लोग क्या कहेंगे?
-कहने दो न। अच्छा पहले मैं चूसती हूँ। .....अब लो पकड़ो यार यह टमाटर।
-पागल, हम पीस लग रहे हैं। देखो, सभी हमें ही घूर रहे हैं।
-घूरेंगें हीं। अमीरों की मुहब्बत का मज़ाक जो उड़ा रहे हैं।

© अजीतपाल सिंह दैया

Friday, October 9, 2015

एक लघु प्रेम कथा- ‘झाँसी’

-देख रहे हो न। किले की कोई दीवार क्या कोई छत तक नहीं छोड़ी।
-इसके बिना प्रेम, प्रेम थोड़ी ही न होता है।
-मतलब जब तक चाक या कोयले से यहाँ जोड़े में नाम नहीं लिख दिया जाये, प्रेम की प्रॉपर रस्म अदायगी नहीं होती है।
-शायद। पर देखो, कहीं भी तो कोई खाली जगह नहीं छोड़ी है। मुझे तो लगता है झाँसी के सारे ही लोग प्रेमी हैं। सबने अपनी अपनी मेहबूबाओं का नाम लिख दिया है यहाँ पर अपने नाम के साथ।
-क्यूँ, किसी महबूबा भी तो लिखा होगा नाम अपने महबूब का। चलो छोड़ो, अरे तुम रानी का किला देखने आई हो या प्रेमियों की निशानियां बांचने।
-रुको, शायद मेरा भी कहीं नाम हो किसी के साथ।
-बस करो। इस बारादरी से बाहर निकलो, जानेमन। श्वानों के मलमूत्र की सडांध से मेरा दम घुटा जा रहा है।
-देखो, मेरा हाथ पकड़ कर खींचा मत करो। चिट्टियां कलाइयाँ मुड़ जाएंगी मेरी। चल तो रही हूँ न।
-लो इधर देखो। ‘कड़क बिजली’ पर भी नाम खोदे हैं। लोहे की इस तोप पर अपने प्रेमी या प्रेमिकाओं के नाम लिखना कितना मुश्किल होता होगा न।
-मुझे तो ये लोहार और लोहारन का नाम ही लगता है। कमबख्त ने तोप बनाने के टाइम ही ढाल दिए होंगे ये नाम।
-अरे उधर देखो। गणेश मंदिर की ओट में दो प्रेमी गुफ़्तगू कर रहे हैं। शायद अपना नाम लिखने के लिए किले में खाली जगह की रिसर्च कर रहे हैं।
-सिल्ली। नाम लिखने के लिए नहीं, बल्कि एक दूजे के बदन के भूगोल का रिसर्च कर रहे हैं। लगता है तुम अहमदाबाद में रहकर भी कभी लव गार्डन नहीं गयी हो।
-तुम्हें तो ऐसे ही खयाल आएंगे। जाकी रही भावना जैसी। बाइ द वे। देट्स लॉं गार्डन, नोट लव गार्डन।
-सो व्हाट? लॉं गार्डन में तुमने किसके हाथ में इंडियन पिनल कोड या क्रिमिनल प्रोसिजर कोड देखा है कभी? अच्छा, बहुत हो गया अब यह किला दर्शन। चलो, चलते हैं यहाँ से। बहुत देख लिया इस खंडहर को। होटल चलते हैं।
-मैं सोच रही हूँ। हमारा नाम भी लिख ही दूँ किले में, किसी खाली स्थान पर। रानी लक्ष्मी बाई भी क्या याद करेगी कि उसके किले में एक अमदावादी जोड़ा आया था।
-अरे ठहरो, क्यूँ कोयले से हाथ काला करती हो?
-रुको तो सही। मैं अभी आई।

-यह क्या, कोई और जगह नहीं मिली। गौस मुहम्मद की कब्र पर लिख दिया।
-और कोई जगह बची कहां थी।
-लेट मी सी। देखूँ तो क्या लिखा है?
-सिमरन लव्स राज। पर ये तो हमारे नाम नहीं हैं।
-क्या फ़र्क़ पड़ता है। शीरीं फ़रहाद हो या सिमरन राज। प्रेम तो किया है न हमने, राज।
-हाँ सिमरन, सच कहती हो तुम।

क्या आप झाँसी में रहते हैं और किले की दीवारों पर अपने प्यार का प्रमाण पत्र नहीं लिखा। धिक्कार है आपके प्रेम पर।

© अजीतपाल सिंह दैया

एक लघु प्रेम कथा- ‘रेस्तरां’

-वेटर, एक कॉफी और लाओ।
-कॉफी ही कॉफी। काफी नहीं हो गयी कॉफी। लगता है तुम मुझे कॉफी में ही निपटा देना चाहती हो।
-नहीं। नहीं। ऐसी बात नहीं है। डिनर भी प्लान करेंगें।
-मैं बेहद खुश हूँ। तुम्हें इतना ख़ुश देखकर।
-मैं सबसे पहले तुमसे शेयर करना चाहती थी यह ख़ुशी।
-आइ एम ट्रूली प्राउड ऑफ यूअर अचीवमेंट। ख़ुशबू सेहरावत, जीएम (फ़ाइनेंस)। इट साउण्ड्स औसम।
-चुप करो। बहुत ज्यादा ही बटर नहीं लगा रहे हो!
-लो, अब सच्ची तारीफ करना भी गुनाह है।
-एक बात कहूँ।
-हाँ, कहो न।
-तुम्हें याद है, जब तुम मुझे पहली बार देखने आए थे।
-हाँ, अच्छी तरह। पापा की जिद थी। तुम उनके दोस्त की लड़की थी। माँ भी सहमत थी। कहा था कि भले घर की लड़की है। अच्छी-पढ़ी लिखी है।
-तो तुम आ गए मुझे देखने। मेरे पापा भी न, ख़ुशी से फूले न समा रहे थे। भारतीय राजस्व सेवा का एक अधिकारी जो उनका दामाद बनने वाला था।
-पर
-पर क्या?
-तुम्हारी वह बात मुझे कतई अच्छी नहीं लगी। सच में, तुमने मेरा मूड ऑफ कर दिया था।
-व्हाट डू यू मीन....मुझे कुछ याद नहीं आ रहा।
-बन रहे हो या सचमुच याद नहीं है।
-तुम याद दिलाओ तो शायद याद आ जाए।
-नाटकबाज़! तुम्हें सब याद है। अटीट्यूड शो ऑफ कर रहे हो।
-अटीट्यूड ही सही। पर कुछ बताओ भी अब।
-यही कि तुमने कहा कि मैं शादी के बाद तुमसे जॉब नहीं करवाऊँगा। मुझे घर में ही रहना होगा। तुम्हारे बच्चे पालने होंगे।
-ओह, हाँ कहा तो था। हाँ याद आया। मेरी यह बात सुन कर तुम्हारा चेहरा गहरी निराशा से भर गया था। मैंने नोटिस किया था। तुम्हें मेरी बात से शॉक लगा था। तुमने सोचा होगा कि कैसा लड़का है। भारत सरकार में ग्रुप ए ऑफिसर और कितनी छोटी सोच।
-सीरियसली। मुझे अच्छा नहीं लगा।
-लगता भी कैसे। मैंने बात ही ऐसी करी थी।
-पर अच्छा ही हुआ। देखो, हम कितने ख़ुश हैं।
-हाँ, तुम्हें इतना ख़ुश देखकर मेरा ख़ुश होना लाज़मी है।
-उस दिन की घटना के बाद, तुम्हारी मॉम का फोन आया था मेरी मॉम के पास कि तुम मुझसे शादी करने के लिए तैयार नहीं हो।
-क्यूँ, मेरा डिसीजन ठीक नहीं था क्या? हम शादी करके शायद कभी ख़ुश नहीं रह पाते, ख़ुशबू। तुम्हारी आँखों में महत्वाकांक्षाएं थी। आइआइएम अहमदाबाद से पोस्ट ग्रेजुएट लड़की को मैं केवल अपने किचन में रोटियाँ बेलते और बच्चों की परवरिश करते नहीं देख सकता था। मुझे एक होम मेकर वाइफ़ चाहिए थी। इसका यह मतलब नहीं है कि मैं महिलाओं द्वारा जॉब करने के खिलाफ़ हूँ। मेरी अपनी च्वाइस है। आफ्टरऑल, सबको अपनी पसंद का पार्टनर चुनने का हक है। वर्किंग वुमन हो या नॉन वर्किंग वुमन, हरेक की अपनी अपनी प्राथमिकताएं हो सकती हैं।
-मुझे मालूम चला था। तुम्हारे शादी के लिए एग्री न होने के पीछे का कारण।
-हाँ। मैं नहीं चाहता था कि मैं एक बहेलिया बनूँ। एक बुलबुल को पिंजरे में डाल कर बंद कर के रख दूँ। और बुलबुल की महत्वाकांक्षाओं के पंख पिंजरे के तारों से टकरा टकरा कर जख्मी हो जाए।
-अब प्रेमचंद जैसी कहानियाँ मत बनाओ। तुम्हारा आइ.आर.एस. में सलेक्शन कैसे हो गया? एक्चुअली, तुम्हें तो दैनिक जागरण में हिन्दी का संपादक होना चाहिए था।
-हाँ, उड़ा लो मज़ाक मेरा। आज तो हक बनता है जीएम मदाम का।
-सुनो। फ्राइडे नाइट को डिनर करते हैं। तुम अवंतिका को लेकर आना।
-तुम अवंतिका को भाभी क्यूँ नहीं बोलती?
-क्यूँ? अवंतिका जिद कर रही है क्या? तुम्हारे घर आना जाना बंद करना पड़ेगा मुझको। पता चला कि किसी दिन तुम्हारी बीवी मेरे हाथ में राखी ही न थमा दे।
-हो भी सकता है।
-ना बाबा। मुझे कोई शौक नहीं है, रिश्तों को नाम देने का। अच्छा सुनो, क्या उसे पता है कि तुम मुझे देखने आए थे?
-हाँ।
-और आज तक देखते आ रहे हो। (एक ठहाका गूँजता है।)
-तुम्हारी हंसी बहुत खूबसूरत है। ऐसा लगता है कि एक पहाड़ी झरना होले होले उतर रहा हो सुरम्य वादियों से मैदान की ओर।
-चुप। मारूँगी अभी।

रेस्तरां के वातावरण में उनके टेबल-क्लोथ पर चित्रित फूलों की सुगंध धीरे धीरे तीव्र होती जा रही थी। पीले रंग की दो तितलियाँ जाने कहाँ से आयीं और उनकी टेबल के इर्दगिर्द मंडराने लगीं।

© अजीतपाल सिंह दैया

Thursday, October 8, 2015

एक लघु प्रेम कथा- ‘अमरकंटक ’

अमरकंटक में नर्मदाजी पर स्थित कपिलधारा वाटरफॉल निहारते हुए।

-तुम्हारी हैयरपिन देना जरा।
-अरे, इस खूबसूरत झरने को देखों न। कितना हसीन है। बाइ द वे, तुम हैयरपिन का क्या करोगे। कान का मैल निकालना है?
-नहीं रे। तुम पहले हैयरपिन दो तो सही।
-ये लो। पर देखो मेरे सारे बाल बिखर गए हैं।
-अच्छी तो लग रही हो। बल्कि खुले बालों में तो तुम पद्मिनी कोल्हापुरे लग रही हो।
-पर तुम मिथुन चक्रवर्ती नहीं लग रहे हो। आइ मीन ‘प्यार झुकता नहीं’ वाला मिथुन।
-तो।
-तो क्या! हाँ, थोड़े से अमोल पालेकर जरूर लग रहे हो।
-अच्छा। तो देखो अब यह अमोल पालेकर क्या करता है?
-क्या?
-प्यार मिटता नहीं।
-क्या? प्यार मिटता नहीं!
-हाँ। जामुन का यह दरख़्त देख रही हो न। इस पर हमारा प्यार अमर करता हूँ, इस अमरकंटक में।
-पर गुजराती में मत लिखना।लोगों को पढ़ने में दिक्कत होगी। और हाँ, सबसे ऊपर लिखो। मेरे प्यार से ऊंचा किसी का प्यार नहीं।
-जामुन के दरख्त का तना कितना नर्म है। बड़ी ही आसानी से अक्षर खुरेद पा रहा हूँ। काश नाम लिखने की तरह इश्क़ भी आसान होता।
-प्रेमिकाएं कोई रजनीगंधाएँ थोड़ी ही होती हैं जो पान की दुकान पर आसानी से मिल जाएगी। अरे अरे। सँभाल के। गिर जाओगे।
-नहीं। बस गोली से बचने के लिए झुका था।
-गोली?
-हाँ। तुम्हारे बाप डैनी डेंजोंगम्पा के गुंडे ने मुझ पर गोली चला दी थी।
-मज़ाक नहीं। मुझे कतई पसंद नहीं कि तुम मेरे पापा की इन्सल्ट करो।
-सॉरी।
-लेट मी सी। देखूँ तो क्या लिखा है तुमने। ‘राज लव्स सिमरन’। पर यह तो हमारा नाम नहीं।
-क्या फ़र्क पड़ता है, सिमरन। प्यार तो किया हैं न।
-हाँ राज।

अमर कंटक की वादियाँ खिलखिला उठीं। नर्मदा के पेट में हँसते-हँसते बल पड़ने लगे।

© अजीतपाल सिंह दैया